(1)
देवराला की छाती से धुआं अभी तक उठता है
रूपकुंवर के चीत्कार को आज भी भारत सुनता है
राख अभी है गर्म चिता की, अभी तलक झुलसाती है
सतीस्थल से आज भी जलते मांस की बदबू आती है
आसमान पर गिद्ध धर्म के आज तलक मंडराते है
अंधे विश्वासों के साये अंधकार गहराते हैं
जिंदा राख बदन पर मलकर मठाधीश गुर्राते है
नारी को यूँ स्वाहा करके फूले नहीं समाते हैं
(2)
खेत मैं करती नलाई और गुडाई है
यह लहलहाती फसल मर्दों के संग उसने उगाई है
वो बच्चे पालती है साथ मैं रोटी कमाती है
कड़ी मेहनत के बल पर चार पैसे घर मैं लाती है
वो पत्थर तोडती है धूप में सड़कें बनाती है
गगनचुम्बी इमारत नींव से ऊपर उठाती है
वो मिल मैं काम करती है, मशीनें भी चलाती है
वो सब्जी बेचने को ठोकरें दर-दर की खाती है
वो बच्चों को पढ़ाती है, किसी लायक बनाती है
मरीजों के लिए राहत की देवी बनके आती है
वकालत भी वो करती है, मुक़दमे भी जिताती है
वो पूरे देश को ताज़ा-तरीं खबरें सुनती है
गरज मर्दों की तरह रात-दिन मेहनत वो करती है
मगर कुछ भी नहीं करने की तोहमत उस पर लगती है
वो है मेहनत की देवी, आलसी फिर भी कहाती है
वो है बलवान पर, दुनिया उसे अबला बताती है
उसे कमज़ोर कहती है उसे नीचा दिखाती है
सताती है, रुलाती है उसे जिंदा जलाती है
वो उसकी ज़िन्दगी को नरक से बदतर बनाती है
हजारों बंदिशों के रात दिन पहरे बिठाती है
(3)
औरतें उठीं नहीं तो ज़ुल्म बढता जाएगा
ज़ुल्म करने वाला सीनाजोर बनता जाएगा
देखो इन महिलाओं को जो आ गई हैं सामने
इनके संग मिल जाओ तो सैलाब रुक न पाएगा
दिल मैं जो डर का किला है तोड़ दो अंदर से तुम
एक ही धक्के मैं अपने आप ही ढह जाएगा
आओ मिलकर हम बढ़ें अधिकार अपने छीन लें
काफिला जो चल पड़ा है, अब न रोका जाएगा
यह गीत देवराला सती कांड पर केन्द्रित फिल्म 'बर्निंग एम्बर्स ' के लिए सफ़दर ने लिखा. यह फिल्म का केंद्रीय गीत था.
