औरत
वह समाज जो कर न सके हर औरत का सम्मान
जिस समाज में बसते हों वहशी जैसे इंसान |
जिस समाज में मां-बहनों की इज्ज़त बिक जाती हो
जहां नज़र हर गुंडे की औरत पर टिक जाती हो |
जहां की कोर्ट- कचहरी पुलिस -हुकूमत सब बहरी हो
जिस समाज का संविधान जैसे दलदल गहरी हो |
जहां नहीं औरत को सड़क पे चलने की आज़ादी
भूखी, नंगी, बेघर, बेबस जहां की हो आबादी |
जहां फ़क़त दो चार लोग अपनी ताक़त के बल पे
रख दें हर नारी को अपने पैरों तले कुचल के |
उस समाज का बहिष्कार अब कर देगा इंसान
मां-बहिनों को मिल पाएगा दुनिया में सम्मान |
कल की सुबह अनोखी होगी कल की शाम निराली
नाचेगी औरत के मन में खेतों की हरियाली |
इस सबको सच करने की अब ली है मन में ठान
मिलकर क़दम बढ़े हैं अब पूरे होंगे अरमान |
