एक पर्दानशीं , मुफ़लिसी में फँसी
उसके खाविंद ने उससे एक दिन कहा
मुफ़लिसी में घिरा हूँ मै कुछ इस तरह
या तो अब्बा से कहो कुछ करे
तुम तो पर खाली हाथ आई हो
सिर्फ दो जोड़े साथ लाई हो
मेरे ऊपर तो फ़कत बोझ हो तुम
इक सहारा नहीं हो बोझ हो तुम
इसलिए ध्यान से सुन लो अब मेरी जाँ
मुझको कोई तुम्हारी कोई ज़रूरत नहीं
आ रहे है अभी मौलवी जी यहाँ
मेरे रास्ते में कोई रुकावट नहीं
खा के इस तरह ठोकरे-शौहर
आ गई वो बेचारी सड़कों पर
कोसती अपने नसीबों को हज़ार
आ के पहुंची वो अपनी माँ के द्वार
अम्मा- अब्बा हुए बहुत नाराज
उसको समझाया ये मज़हब का राज़
तेरे शौहर को हक़ है यह सुन ले
चाहे तो चार वह निकाह कर ले
तेरा तो फ़र्ज़ है कि सब कुछ सह ले
अपनी सौतन के संग संग रह ले
लौटकर के जो यहाँ आएगी
रोटियां हमसे छीन खाएगी
भाई - भाभी भी उससे यह बोले
लौट जा और अपनी राह होले
ऐसी बातें सुनी, सुन के दंग रह गई
सर झुका के कहा अब मैं जाऊं कहाँ
जिसके खाविंद ने उसपे ढाया सितम
उस नवेली दुल्हन की है ये दास्ताँ
जिंदगी घर में ही बिताई थी
एक अक्षर भी पढ़ न पाई थी
कभी सीखा नहीं था कोई हुनर
सोचा था घर में ही कटेगी उमर
अब पड़ी उस पे आ के वक़्त की मार
हो गई इस जहां से वो बेज़ार
तभी उससे कहा किसी ने ये
क्यों ना तू न्याय की शरण ले ले
मर्द को अब सजा नहीं मिलती
औरतें की नहीं है अब कुछ चलती
दे दे मुस्लिम मर्द अगर कि तलाक
बीवी-बच्चों को कर दे इक दिन आक़
अब तो कानून नया आया है
नई सरकार ने बनाया है....
बोली वो, यह तो है मज़हब के खिलाफ
हर नज़र से तो यह है नाइंसाफ
यह तो कुरान में ही आया है
फ़र्ज़े- शौहर उसे बनाया है
बीवी को गर तलाक दे भी दे
उसकी रोटी का पूरा खर्चा दे
जज ये बोला जरा मेरी सुन ले
तू ये बातों को जा के उससे कह
बनते है दीन के जो ठेकेदार
पूरी मिल्लत के वोट के हक़दार
उन्हीं से जाके पूछ ऐ बेटी
क्यों करी दीन से ये गद्दारी
उसने जब ये सुना , सुन के उसको लगा
अब नहीं मेरा दुनिया में कोई बचा
ना ही मज़हब की मुझको मिलेगी दया
तभी उसने ये देखा नज्ज़ारा
और कानों में पड़ा एक नारा -
औरतें अब नहीं रहीं कमज़ोर
उनकी आवाज भी बनी पुरजोर
दकियानूसी उसूल तोड़ेंगे
इस गुलामी की चूल तोड़ेंगे
औरतों का जुलूस आता था
गर्म सड़कों पे बढ़ता जाता था
उसको ऐसा लगा की ये बहनें
उसको आवाज़ दे बुलाती हैं
आओ ए पर्दा- नशीनो आओ
अपनी बहनों की सफ में आ जाओ
ऐसे जुल्मो- सितम से लड़ना है
इसको जड़ से तमाम करना है
अपने दिल से सुनी जो ये आवाज़
धीरे धीरे वो आई उनके पास
और उनकी सफों में जा पहुँची
अपनी मंजिल पे जैसे आ पहुँची
उसको दुनिया से लड़ने की ताकत मिली
मिल गया उसको जैसे नया ही जहाँ
जिसके खाविंद ने उसपे ढाया सितम
उस नवेली दुल्हन की है ये दास्ताँ .
('मुस्लिम महिला विधेयक' के संदर्भ में ' इन सेकूलर इंडिया '
नामक डाक्युमेंटरी फिल्म के लिए लिखी गयी नज़्म.)
